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Indian Railway: जानिए ट्रेन से जुड़ी बड़ी जानकारी, रेल कैसे ढूंढ लेती है अपना प्लेटफार्म

Indian Railway: जानिए ट्रेन से जुड़ी बड़ी जानकारी, रेल कैसे ढूंढ लेती है अपना प्लेटफार्म
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अपने रेल से सफर तो जरूर ही किया होगा। इसके अलावा आपके मन में ट्रेन को लेकर कई तरह की बातें भी मन में आती होगी जैसे की रेल की पटरी बिछाने में कितना खर्च आता है। आपको बता दे की रेलवे की पटरी बिछाने में करोड़ों रुपए का खर्च आता है। इसके अलावा रास्ते में फूल या फिर पहाड़ी होता है तो लागत और भी ज्यादा बढ़ जाती है जिन पटरियों पर ट्रेन रफ्तार से दौड़ती है। आज हम उनके बारे में कई सवालों को जानेंगे। अक्सर अपने सोचा होगा कि कोई भी स्टेशन आने पर ट्रेन को कैसे पता चल जाता है। उदाहरण के लिए गुवाहाटी एक्सप्रेस को नंबर तीन पर और रेवांचल एक्सप्रेस को नंबर 6 पर जाना है, इसके अलावा वहां पर कई तरह के प्लेटफार्म होते हैं और बहुत सारी पटरियां बिछी होती है। जिस ट्रेन से हम सफर करते हैं वह कई बार अपना ट्रैक भी बदलता है ऐसा लगता है कि मानो ट्रेन को पहले से पता था कि मुड़कर किस दिशा में जाना है।

ट्रेन कैसे बदलता है अपनी पटरी

आपको बता दें की ट्रेन की पटरियों का कनेक्शन बहुत ही अजीबोगरीब होता है। यह अचानक से ही अपना रास्ता बदल लेती है और इधर-उधर से नई पटरी पकड़ लेती है। आपको बता दे की जिस पटरी पर ट्रेन चलती है उसे मेन लाइन कहते हैं। लेकिन जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन को रुकना होता है और उसे प्लेटफार्म की तरफ जाने पर उसे लूप लाइन कहते है। इस किनारे पर प्लेटफॉर्म भी बने होते हैं दूसरी दिलचस्प बात यह है कि यह लाइन स्टेशन मास्टर का अधिकार क्षेत्र होता है मेन लाइन पर ट्रेन को कंट्रोलर देखा है इसके बाद स्टेशन मास्टर तय करता है कि किसी ट्रेन को किस लूप लाइन पर लेना है। आपको बता दे कि जमाना इतना आगे बढ़ गया है कि मशीनों की मदद से ट्रेन की पटरी बदली जाती है। इस तरह से पटरी जिधर जाएगी उधर ट्रेन चलती है इसके लिए सिर्फ दिशा के अनुसार ट्रेन को मुड़ना पड़ता है।

क्या होता है स्लीपर के नीचे स्लीपर

यह एक तरह की पहेली है जिसे बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं। इसके नीचे जो लंबवत छोटे-छोटे खंबे लगे होते हैं उसे स्लीपर कहा जाता है। अगर आपने बचपन में मम्मी पापा से पूछा होगा तो उन्होंने बताया होगा कि पहले यह स्लीपर लकड़ी के हुआ करते थे। लेकिन लकड़ी के होने के कारण यह जल्दी ही सड़ जाते थे। इसके बाद अब सीमेंट के स्लीपर लगाए जाते हैं। रेल और स्लीपर को जोड़ने के लिए क्लिप लगाई जाती है इसके अलावा विशेष तरह का नट बोल्ट भी समझा जाता है। वैसे तो स्लीपर काफी कम ही दिखता है क्योंकि उनके आसपास गिट्टी बिछी होती है ताकि ट्रैक रास्ते से ना हटे। इस तरह से एक ट्रेन को मैनेज किया जाता है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं खासकर पटरियों का खेल बहुत कम लोगों को समझ आता है।

Rohit Kumar

Rohit Kumar

Has about 3 years of experience in the field of media. Started career with VR100 news channel, where worked on digital media for 1 year. After this, I got the experience of working on input for about 2 months in NextKhabar channel. After this, he got 2 years experience as Anchor cum Producer in National India News. Now serving in Vrsamachar website. Working here on gadgets and entertainment news. Our aim is to deliver great stories to the people.


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